आज के समय में युद्ध केवल बंदूकों और तोपों से नहीं लड़े जाते, बल्कि असली लड़ाई तकनीक और सटीक डेटा की होती है। हाल ही में कुछ ऐसी रिपोर्ट्स सामने आई हैं जो इशारा करती हैं कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर के बेहद दुर्गम और जटिल पहाड़ी इलाकों की उन्नत LiDAR (लायडार) तकनीक के जरिए 3D मैपिंग कर रहा है।
अगर यह सच है, तो यह भारतीय डिफेन्स ग्रिड के लिए एक नई सामरिक चुनौती हो सकती है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि यह जटिल तकनीक क्या है और दुश्मन इसका क्या फायदा उठा सकता है।
LiDAR क्या है और यह 2D नक्शों से कैसे अलग है?
आपने पारंपरिक नक्शे (जैसे 2D मैप्स) देखे होंगे, जो जमीन को सपाट दिखाते हैं। लेकिन LiDAR (Light Detection and Ranging) एक ऐसी अत्याधुनिक तकनीक है जो ड्रोन या विमान से जमीन पर लेजर किरणें (Laser pulses) भेजती है। जब ये किरणें टकराकर वापस लौटती हैं, तो यह उस पूरे इलाके का एक हूबहू, बेहद सटीक 3D मॉडल तैयार कर देती है।इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह घने जंगलों और पेड़ों के पत्तों के पार भी देख सकती है। यानी अगर किसी पहाड़ पर घने जंगल के नीचे कोई रास्ता या आतंकी बंकर है, तो LiDAR उसे भी 3D स्क्रीन पर दिखा देगा।
जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य में, जहाँ ऊंचे पहाड़, संकरी घाटियां और घने जंगल हैं, वहां इस स्तर की जानकारी होना किसी भी सेना के लिए 'ब्रह्मास्त्र' के समान है।
पाकिस्तान की चाल और इसके सामरिक मायने
'सर्वे ऑफ पाकिस्तान' (Survey of Pakistan) ने खुद खुले तौर पर यह माना है कि वे अपने देश में ड्रोन (UAV) आधारित LiDAR, GNSS और डिजिटल मैपिंग तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं।हालांकि, अभी तक सार्वजनिक डोमेन में ऐसा कोई पक्का सबूत नहीं है कि उन्होंने सीमा पार करके भारतीय नियंत्रण वाले जम्मू-कश्मीर की मैपिंग की है। इसलिए इसे फिलहाल एक आशंका ही माना जा रहा है, लेकिन रक्षा मामलों में हर आशंका के लिए तैयार रहना ही सच्ची रणनीति है।
अगर दुश्मन के पास हमारे इलाकों का सटीक 3D मॉडल आ जाता है, तो उसे कई बड़े सामरिक फायदे हो सकते हैं:
- आर्टिलरी और रडार प्लानिंग: तोपखाने (Artillery) से गोले दागने के लिए एकदम सटीक ऊंचाई और दूरी का अंदाजा लगाना। साथ ही, यह पता लगाना कि पहाड़ों की बनावट के कारण रडार के 'ब्लाइंड स्पॉट' (जहाँ रडार काम नहीं करता) कहाँ बन रहे हैं।
- बदलाव की पहचान (Change Detection): अगर भारतीय सेना कोई नई सड़क, पुल या सैन्य ढांचा बनाती है, तो दुश्मन पुरानी और नई 3D इमेज की तुलना करके तुरंत हमारे नए निर्माण को पकड़ सकता है।
- सटीक घुसपैठ और सिमुलेशन: आतंकियों को भेजने के लिए घाटियों और ढलानों का ऐसा रास्ता खोजना जो हमारी चौकियों की नज़रों (Line of Sight) से बचा हो।
क्या भारत पीछे है? बिल्कुल नहीं!
LiDAR तकनीक अपने आप में किसी टारगेट पर खुद हमला नहीं करती या रियल-टाइम इंटेलिजेंस नहीं देती; इसका असली फायदा तब होता है जब इसे सैटेलाइट इमेजरी, इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस और ड्रोन्स (C4ISR) के साथ जोड़ा जाए।अगर पाकिस्तान ने वास्तव में ऐसा डेटा जुटा लिया है, तो यह उनके मिलिट्री प्लानर्स के लिए एक 'इंटेलिजेंस मल्टीप्लायर' का काम जरूर करेगा।
लेकिन, जब बात देश की सुरक्षा की हो, तो भारत किसी से पीछे नहीं है। यह सोच लेना कि पाकिस्तान के पास यह तकनीक है तो भारत के पास नहीं होगी, एक बड़ी भूल होगी। भारत के पास पहले से ही बेहद मजबूत जियो-स्पेशियल (Geospatial) इंटेलिजेंस और 3D मैपिंग की स्वदेशी ताकत मौजूद है।
कुछ अतिरिक्त तथ्य जो आपको जानने चाहिए:
- स्वदेशी 'Indigis' प्लेटफॉर्म: DRDO की लैब (CAIR) ने भारतीय सेना के तीनों अंगों के लिए 'Indigis' नाम का एक एकीकृत जियो-स्पेशियल इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म तैयार किया है। इसमें किसी भी विदेशी तकनीक का इस्तेमाल नहीं हुआ है और यह युद्ध के मैदान में एकदम सटीक 3D डेटा देता है।
- कार्टोसैट (Cartosat) की ताकत: ISRO के हाई-रेजोल्यूशन सैटेलाइट्स अंतरिक्ष से ही दुश्मन की हर हरकत का 3D मैप बनाने में सक्षम हैं।
- एडवांस GIS: भारतीय सेना के पास अत्याधुनिक GIS (Geographic Information System) और डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (DSS) हैं, जो जम्मू-कश्मीर के चप्पे-चप्पे का 3D रिलीफ मॉडल और लाइन-ऑफ-साइट एनालिसिस करते हैं।