दोस्तों, भविष्य के युद्ध आसमान में लड़े जाएंगे, और इसमें छठी पीढ़ी (6th-Generation) के लड़ाकू विमान गेम-चेंजर साबित होने वाले हैं।
ब्रिटेन, जापान और इटली मिलकर 'ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम' (GCAP) के तहत एक ऐसा ही महा-विनाशक और अत्याधुनिक फाइटर जेट बना रहे हैं। लेकिन इस बीच, इसकी होश उड़ा देने वाली कीमत और भारत की इस प्रोजेक्ट में एंट्री ने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है।
आइए आसान भाषा में समझते हैं कि इस भारी-भरकम प्रोजेक्ट के पीछे का विज्ञान और कूटनीति क्या है।
$600 मिलियन का लड़ाकू विमान! आखिर इतना महंगा क्यों?
कल्पना कीजिए एक ऐसे लड़ाकू विमान की, जिसकी कीमत लगभग 600 मिलियन डॉलर (करीब 5000 करोड़ रुपये) प्रति यूनिट हो सकती है!हालांकि, आपको बता दें कि यह कोई अंतिम या आधिकारिक कीमत नहीं है। खुद यूके की संसदीय डिफेंस कमेटी का कहना है कि इस पूरे महा-प्रोजेक्ट की कुल लागत अभी "अनिश्चित" है।
हाल ही में, इन तीनों साझेदार देशों ने विमान के आगे के विकास के लिए 4.6 बिलियन पाउंड के समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। ध्यान रहे, यह रकम बने-बनाए फाइटर जेट खरीदने के लिए नहीं, बल्कि केवल इसके विकास और रिसर्च के लिए है।
इसके अलावा, अकेले यूके अगले चार वर्षों में GCAP के लिए 8.6 बिलियन पाउंड का भारी-भरकम निवेश करने जा रहा है।
इस विमान की लागत आसमान छूने का एक बड़ा कारण इसकी क्षमताएं हैं।
विशेष रूप से जापान चाहता है कि विमान की मारक क्षमता (रेंज) और उड़ान का समय (एंड्योरेंस) बेहद ज्यादा हो, ताकि वह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन जैसी ताकतों को कड़ा जवाब दे सके।
जाहिर है, जब तकनीक भविष्य की होगी, तो लागत भी भविष्य वाली ही होगी।
भारत का 'डायलॉग पार्टनर' बनना: इसके क्या मायने हैं?
हाल ही में भारत इस अति-महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट में "डायलॉग पार्टनर" (संवाद भागीदार) के रूप में शामिल हुआ है। सामरिक दृष्टि से यह भारत का एक बेहतरीन कदम है।लेकिन इसे सरल भाषा में समझें—'डायलॉग पार्टनर' बनने का मतलब यह नहीं है कि भारत इस विमान को बना रहा है या रातों-रात इसे खरीदने वाला है।
इस दर्जे के तहत भारत को इस विमान की अंदरूनी और खुफिया कोर तकनीक (underlying technological development) का एक्सेस नहीं मिलेगा।
फिर फायदा क्या है? फायदा यह है कि भारत को अब आधिकारिक टेबल पर बैठकर चर्चाओं में हिस्सा लेने, जानकारियां जुटाने और यह समझने का मौका मिलेगा कि दुनिया के सबसे एडवांस फाइटर जेट्स कैसे आकार ले रहे हैं।
चूंकि भारत पहले से ही अपने 5वीं पीढ़ी के AMCA पर तेजी से काम कर रहा है और 6ठी पीढ़ी की तकनीक की तरफ कदम बढ़ा रहा है, इसलिए यह "डायलॉग" हमारी अपनी वायुसेना के विजन को और धारदार बनाएगा।
क्या भारत के आने से विमान सस्ता होगा?
एक तर्क यह दिया जा रहा है कि अगर भारत भविष्य में सिर्फ 'डायलॉग' से आगे बढ़कर इसे बनाने या खरीदने के लिए औपचारिक साझेदार (development/purchase partner) बन जाता है, तो इससे R&D और निर्माण में लगने वाली भारी फिक्स्ड लागत एक बड़े बेस (ज्यादा देशों) में बंट जाएगी।लेकिन, रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की मौजूदगी से विमान रातों-रात सस्ता नहीं हो जाएगा।
ऐसा इसलिए क्योंकि अगर भारत पूर्ण साझेदार बनता है, तो वह केवल पैसे नहीं देगा, बल्कि 'मेक इन इंडिया' के तहत काम का हिस्सा (workshare), तकनीक हस्तांतरण (Technology Transfer) और भारतीय वायुसेना की जरूरतों के हिसाब से डिजाइन में बदलाव की मांग भी करेगा।
कई बार इन शर्तों और वार्ताओं के कारण प्रोजेक्ट अधिक पेचीदा और खर्चीले हो जाते हैं।
निष्कर्ष: मास्टरस्ट्रोक खेल रहा है भारत
ओपन सोर्स इंटेलिजेंस और हालिया रक्षा रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत अपने पत्ते बहुत समझदारी से खेल रहा है।एक तरफ हम ब्रिटेन-जापान के GCAP के साथ बातचीत कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ हम फ्रांस के नेतृत्व वाले एक अन्य 6th-Gen प्रोजेक्ट 'FCAS' (फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम) पर भी नजरें बनाए हुए हैं।
हमारा लक्ष्य एकदम स्पष्ट है—अपनी वायुसेना को भविष्य की ऐसी अजेय तकनीक से लैस करना कि कोई भी दुश्मन हमारी सरहदों की तरफ देखने की हिम्मत न कर सके।