विश्लेषण WhAP से लेकर जोरावर तक: प्रोटोटाइप और ToT तो मिले, लेकिन बड़े डिफेंस ऑर्डर्स के बिना क्या टिकाऊ रहेगा निजी कंपनियों का निवेश?

WhAP से लेकर जोरावर तक: प्रोटोटाइप और ToT तो मिले, लेकिन बड़े डिफेंस ऑर्डर्स के बिना क्या टिकाऊ रहेगा निजी कंपनियों का निवेश?


'आत्मनिर्भर भारत' अभियान के तहत आज हमारा डिफेंस सेक्टर जिस तेजी से बदल रहा है, वह हर भारतीय के लिए गर्व की बात है।

कभी हथियारों के लिए विदेशों का मुंह ताकने वाला भारत, आज अपनी देसी कंपनियों के दम पर अत्याधुनिक हथियार और बख्तरबंद गाड़ियां बना रहा है।

सरकार द्वारा निजी कंपनियों को 'ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी' (ToT) यानी तकनीक का हस्तांतरण करना एक मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ है। इससे देश का औद्योगिक आधार मजबूत हो रहा है।

लेकिन, इस शानदार तस्वीर के पीछे एक ऐसा कड़वा सच भी छिपा है जिस पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है।

सवाल यह है कि - अगर हम कंपनियों को तकनीक (ToT) तो दे दें, उनके प्रोटोटाइप (नमूने) भी पास कर दें, लेकिन उन्हें बड़े ऑर्डर्स न दें, तो क्या ये कंपनियां लंबे समय तक टिक पाएंगी?

आइए, इसे कुछ बेहतरीन और आधुनिक स्वदेशी मिलिट्री प्लेटफॉर्म्स के जरिए समझते हैं।

टाटा का WhAP: सफलता की कहानी और एक सबक​

आर्मर्ड व्हीकल्स (बख्तरबंद गाड़ियों) के क्षेत्र में भारत का स्वदेशी इकोसिस्टम तेजी से उभर रहा है।

इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है टाटा का WhAP (Wheeled Armoured Platform)। तकनीकी भाषा को आसान शब्दों में कहें तो, यह 8x8 पहियों वाला एक ऐसा अभेद्य किला है जो दलदल, खाइयों और पानी में भी दुश्मनों के छक्के छुड़ा सकता है।

खुशी की बात यह है कि यह स्वदेशी प्लेटफॉर्म न सिर्फ भारतीय सेना में अपनी सेवाएं दे रहा है, बल्कि अफ्रीकी देश मोरक्को से इसे एक बड़ा एक्सपोर्ट ऑर्डर भी मिला है।

यह साबित करता है कि भारत में बनी डिफेंस मशीनरी ग्लोबल मार्केट में भी व्यावसायिक रूप से हिट है।

लेकिन यहीं पर एक पेंच है। सिर्फ तकनीक मिल जाना या शुरुआती डेवलपमेंट कॉन्ट्रैक्ट मिल जाना ही काफी नहीं है।

किसी भी बेहतरीन प्रोडक्ट को सस्ता और फायदेमंद (Economies of Scale) बनाने के लिए टुकड़ों में नहीं, बल्कि लगातार बड़े ऑर्डर्स की जरूरत होती है।

प्रोजेक्ट जोरावर (Zorawar): पहाड़ों का सिकंदर और निवेश का जोखिम​

अब बात करते हैं सेना के बेहद महत्वाकांक्षी 'प्रोजेक्ट जोरावर' की। लगभग ₹20,000 करोड़ के इस लाइट-टैंक सिस्टम प्रोजेक्ट में भारी निजी निवेश देखने को मिल रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) इसमें सबसे कम बोली लगाने वाली (L1) कंपनी बनकर उभरी है, जबकि महिंद्रा डिफेंस सिस्टम्स को भी अपना प्रोटोटाइप तैयार करने का समय दिया गया है।

मिलिट्री इंजीनियरिंग के लिहाज से सेना के लिए यह 'कॉम्पिटिटिव अप्रोच' (प्रतिस्पर्धात्मक रवैया) बहुत फायदेमंद है।

सेना को अलग-अलग कंपनियों के डिज़ाइन और तकनीक परखने का मौका मिलता है। लेकिन असली परीक्षा प्रोटोटाइप के ट्रायल के बाद शुरू होती है।

बिज़नेस का गणित: हारने वाली कंपनी के इंफ्रास्ट्रक्चर का क्या होगा?​

डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग कोई आम फैक्ट्री नहीं है; इसमें हजारों करोड़ का निवेश, स्पेशल मशीनरी और स्किल्ड मैनपावर लगती है।

मान लीजिए दो कंपनियों ने इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी पैसा लगाया, लेकिन अंत में किसी एक को ही बड़ा प्रोडक्शन ऑर्डर मिला।

ऐसे में जिस कंपनी को ऑर्डर नहीं मिला, उसके करोड़ों रुपये के इंफ्रास्ट्रक्चर का क्या होगा? उनके पास अपने उत्पाद को बेचने के लिए बहुत सीमित बाजार बचता है।

सेना अगर प्रोटोटाइप पास होने के सालों बाद तक ऑर्डर्स देने में देरी करती है, तो कोई भी प्राइवेट कंपनी खाली बैठी फैक्ट्री का भारी खर्च नहीं उठा सकती। यह बहुत महंगा सौदा है।

आगे का रास्ता क्या है?​

सरकार ने घरेलू रक्षा खरीद को जो बढ़ावा दिया है, उसके नतीजे बेहद शानदार रहे हैं। भारतीय इंडस्ट्री में डिफेंस का ग्लोबल हब बनने का पूरा माद्दा है।

लेकिन अब समय आ गया है कि भारत ToT, 'डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनरशिप (DCPP)' और 'मेक' (Make) प्रोग्राम्स की नीतियों को थोड़ा और व्यावहारिक बनाए।
  • तय न्यूनतम ऑर्डर्स: जब तकनीक ट्रांसफर की जाए, तो उसके साथ एक स्पष्ट प्रोडक्शन शेड्यूल और 'मिनिमम ऑर्डर क्वांटिटी' (न्यूनतम खरीद की गारंटी) होनी चाहिए।
  • एक्सपोर्ट पर फोकस: अगर घरेलू मांग कम भी हो, तो सरकार को इन कंपनियों के उत्पाद विदेशों में बेचने (Export potential) के लिए कूटनीतिक मदद करनी चाहिए।
  • त्वरित फैसले: 'जोरावर' जैसे अहम प्रोजेक्ट्स में, ट्रायल्स पूरे होते ही सेना को अपने पसंदीदा डिजाइन पर मुहर लगाकर तुरंत बड़े पैमाने पर खरीद शुरू कर देनी चाहिए। सालों तक फाइलों का लटकना निजी कंपनियों का मनोबल तोड़ सकता है।
हर कंपनी को बराबर का ऑर्डर मिले, यह जरूरी नहीं है। प्रतिस्पर्धा भी क्वालिटी सुधारने के लिए बेहद जरूरी है।

लेकिन करोड़ों रुपये का जोखिम उठाने से पहले, हमारे निजी रक्षा निर्माताओं को भविष्य की मांग का एक पारदर्शी और स्पष्ट विजन मिलना ही चाहिए। तभी हमारा 'आत्मनिर्भर भारत' का संकल्प सही मायनों में अजेय बनेगा!
 

खास खबरें

हाल के रिप्लाई

लोकप्रिय टॉपिक

Forum statistics

Threads
22
Messages
22
Members
35
Latest member
Vikram Jain
Back
Top