भारतीय वायुसेना की रीढ़ और आसमान का महाबली कहे जाने वाले सुखोई-30 MKI (Su-30MKI) लड़ाकू विमानों का बहुचर्चित 'सुपर सुखोई' अपग्रेड कार्यक्रम अब रफ्तार पकड़ रहा है।
आम तौर पर लोगों को लगता है कि इस अपग्रेड का मतलब सिर्फ एक नया रडार लगाना, कुछ नए एवियोनिक्स जोड़ना और अत्याधुनिक मिसाइलें (जैसे अस्त्र मार्क-2, मार्क-3 या ब्रह्मोस) फिट करना है।
लेकिन, इस महा-अपग्रेड की असली कहानी विमान के बाहरी ढांचे के बजाय इसके अंदर छिपी है।
सीधे शब्दों में कहें तो भारतीय वायुसेना और DRDO मिलकर इस लड़ाकू विमान को सिर्फ एक फाइटर जेट से बदलकर एक डेटा-आधारित, नेटवर्क से जुड़ा 'फ्लाइंग सुपरकंप्यूटर' बनाने जा रहे हैं।
विरूपाक्ष रडार और 'डेटा की सुनामी
'रक्षा मंत्रालय ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) और DRDO के नेतृत्व में वायुसेना के बेड़े के लगभग 272 सुखोई विमानों में से शुरुआती 84 जेट्स को अपग्रेड करने के लिए 60,000 करोड़ रुपये से अधिक के प्रोजेक्ट को मंजूरी दी है।इस अपग्रेड की सबसे बड़ी खासियत है पूर्णतः स्वदेशी 'विरूपाक्ष' AESA (एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे) रडार।
आधुनिक AESA रडार सिर्फ दुश्मन को मीलों दूर से देखने वाली 'आंख' भर नहीं होते, बल्कि वे एक बेहद ताकतवर इन्फॉर्मेशन-प्रोसेसर भी होते हैं।
अपग्रेड होने के बाद सुखोई-30MKI हवा और जमीन दोनों जगहों से भारी मात्रा में डेटा ग्रहण करेगा।
इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल्स, मिसाइल ट्रैकिंग, AWACS (हवाई रडार सिस्टम), ग्राउंड कंट्रोल और खुद के सेंसर—इन सब से इतनी ज्यादा जानकारी कॉकपिट में आएगी कि यह किसी 'डेटा सुनामी' से कम नहीं होगी।
सेंसर फ्यूजन: आसान भाषा में समझें इसका विज्ञान
अब सवाल उठता है कि इस डेटा सुनामी का पायलट क्या करेगा? यहीं पर बात आती है सेंसर फ्यूजन (Sensor Fusion) की।मान लीजिए कि आसमान में दुश्मन का एक विमान है। सुखोई का विरूपाक्ष रडार उसे देख रहा है, उसका IRST (इंफ्रारेड सेंसर) उसकी गर्मी पकड़ रहा है, उसका RWR (रडार वार्निंग रिसीवर) उसके सिग्नल पकड़ रहा है और पीछे उड़ रहा हमारा AWACS भी उसी दुश्मन की जानकारी भेज रहा है।
अगर यह सारा डेटा पायलट की स्क्रीन पर अलग-अलग दिखेगा, तो स्क्रीन पर एक दुश्मन के चार-चार निशान बन जाएंगे। युद्ध के तनावपूर्ण माहौल में यह पायलट को भ्रमित कर देगा।
यही कारण है कि DRDO की लैब DARE (डिफेंस एवियोनिक्स रिसर्च इस्टैब्लिशमेंट) सुखोई के लिए एक बेहद ताकतवर 'डिस्प्ले प्रोसेसर-30' (DP-30) और नया मिशन कंप्यूटर बना रही है।
यह कंप्यूटर इस सारे डेटा को 'फ्यूज' (मिलाकर) करके पायलट की स्क्रीन पर दुश्मन का सिर्फ एक सटीक 'टैक्टिकल ट्रैक' दिखाएगा।
क्या-क्या सोचेगा नया सुपर सुखोई?
एक आधुनिक युद्ध क्षेत्र में यह नया इलेक्ट्रॉनिक-वॉरफेयर (EW) सिस्टम सिर्फ यह नहीं बताएगा कि "दुश्मन कहां है?" बल्कि यह खुद-ब-खुद पल-पल आकलन करेगा कि:- "मुझे कौन सा रडार ट्रैक कर रहा है?"
- "क्या मुझ पर कोई मिसाइल दागी गई है?"
- "अगर दो मिसाइलें आ रही हैं, तो सबसे ज्यादा खतरनाक कौन सी है?"
- "आसपास हमारे और कौन से विमान मौजूद हैं जो मदद कर सकते हैं?"
जैमिंग का खतरा और सुखोई का विशाल आकार
नेटवर्क से जुड़े होने का एक नुकसान यह है कि दुश्मन डेटा लिंक को हैक या जैम करने की कोशिश कर सकता है।लेकिन सुपर सुखोई को इस तरह से डिजाइन किया जा रहा है कि अगर कभी नेटवर्क कट भी जाए, तो विमान के अपने सेंसर और कंप्यूटर उसे अकेले ही लड़ाई लड़ने में पूरी तरह सक्षम रखेंगे।
एक नया AESA रडार, एडवांस मिशन कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट बहुत ज्यादा बिजली और कूलिंग (ठंडक) मांगते हैं। यहीं पर सुखोई-30MKI का विशाल आकार (Large Airframe) हमारे लिए एक वरदान साबित होता है।
छोटे लड़ाकू विमानों में अतिरिक्त तार, कूलिंग सिस्टम या बड़े पावर जेनरेटर लगाने की जगह नहीं होती, लेकिन सुखोई के विशाल ढांचे में भविष्य के ढेरों इलेक्ट्रॉनिक उपकरण आसानी से फिट किए जा सकते हैं।
भविष्य की नींव: AMCA और TEDBF का रास्ता
सुपर सुखोई कार्यक्रम के मायने सिर्फ सुखोई-30MKI तक सीमित नहीं हैं। यह भारतीय रक्षा क्षेत्र के लिए एक 'मास्टरक्लास' है।इस प्रोग्राम में स्वदेशी मिशन कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, रडार तकनीक और नेटवर्किंग के जरिए जो अनुभव हासिल होगा, वह भविष्य में भारत के 5वीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर AMCA (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट), नौसेना के TEDBF और भविष्य के मानवरहित (Unmanned) लड़ाकू ड्रोन विमानों की सफलता की सबसे मजबूत नींव रखेगा।
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में सुपर सुखोई सिर्फ एक अपग्रेड नहीं, बल्कि आसमान में भारत के 'अभेद्य रक्षा कवच' का सबसे मजबूत स्तंभ बनने जा रहा है।