राय तेजस Mk2 और AMCA के ग्लोबल एक्सपोर्ट के लिए सिर्फ बेहतरीन विमान काफी नहीं, बल्कि OSA, प्रोडक्शन और इंजन इंडिपेंडेंस भी है जरूरी?

तेजस Mk2 और AMCA के ग्लोबल एक्सपोर्ट के लिए सिर्फ बेहतरीन विमान काफी नहीं, बल्कि OSA, प्रोडक्शन और इंजन इंडिपेंडेंस भी है जरूरी?


भारत अब केवल अपने सशस्त्र बलों की ज़रूरतें पूरी करने तक सीमित नहीं रहना चाहता। 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' का अगला चरण है—दुनिया के लड़ाकू विमानों (combat aircraft) के बाज़ार में भारत का दबदबा।

तेजस Mk1 ने यह साबित कर दिया है कि हमारे पास विश्वस्तरीय फाइटर जेट डिज़ाइन करने और बनाने की तकनीकी क्षमता है।

लेकिन, जब हम तेजस Mk2 और 5वीं पीढ़ी के अत्याधुनिक AMCA के जरिए ग्लोबल मार्केट में उतरने का सपना देख रहे हैं, तो हमें यह समझना होगा कि दुनिया में हथियार बेचने के लिए सिर्फ एक शानदार विमान बनाना ही काफी नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय बाज़ार (Rafale, F-16, Gripen E और KF-21 जैसे दिग्गजों) से मुकाबला करने के लिए भारत को अपनी रणनीति में कुछ बड़े और क्रांतिकारी बदलाव करने होंगे।

आइए समझते हैं कि भारत को एक्सपोर्ट किंग बनने के लिए क्या-क्या चाहिए।

1. हथियारों की आज़ादी: ओपन सिस्टम आर्किटेक्चर (OSA)​

सोचिए, आपने एक महंगा स्मार्टफोन खरीदा, लेकिन कंपनी ने शर्त लगा दी कि आप इसमें सिर्फ उसी कंपनी के ईयरफोन और चार्जर इस्तेमाल कर सकते हैं। कोई भी ग्राहक ऐसी बंदिश पसंद नहीं करेगा। लड़ाकू विमानों के मामले में भी ऐसा ही है।

आधुनिक वायुसेनाएं चाहती हैं कि वे अपने फाइटर जेट्स में अपनी पसंद के हथियार, रडार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर (EW) सिस्टम लगा सकें। तेजस Mk1 और राफेल जैसे विमानों में 'प्रोप्रायटरी सॉफ्टवेयर' होता है, जो विदेशी हथियारों को आसानी से जुड़ने नहीं देता।

यहीं पर भारत को ओपन सिस्टम आर्किटेक्चर (OSA) को अपनाना होगा। आसान शब्दों में कहें तो यह विमान को एक 'प्लग-एंड-प्ले' सिस्टम बना देगा।

अगर कोई अफ्रीकी या आसियान (ASEAN) देश हमारा तेजस Mk2 खरीदता है, और उसके पास पहले से ही कुछ रूसी या फ्रांसीसी मिसाइलें मौजूद हैं, तो वह बिना किसी भारी बदलाव के उन मिसाइलों को हमारे विमान में लगा सके।

भारत को अपने स्वदेशी 'Astra' मिसाइल परिवार को एक बेहतरीन डिफ़ॉल्ट विकल्प के तौर पर ज़रूर पेश करना चाहिए, लेकिन ग्राहक को अपनी पसंद के हथियार जोड़ने की आज़ादी होनी चाहिए।

भारत वैसे भी सुखोई Su-30MKI (रूसी ढांचा, इज़रायली एवियोनिक्स, फ्रांसीसी नेविगेशन और भारतीय मिसाइलें) के ज़रिए कई देशों की तकनीकों को एक साथ जोड़ने का उस्ताद रहा है, और यही हमारा सबसे बड़ा 'सेलिंग पॉइंट' बन सकता है।

2. समय पर डिलीवरी: प्रोडक्शन और SPV मॉडल का कमाल​

हथियार बाज़ार में समय की कीमत सोने से भी ज्यादा है। कोई भी देश ऐसे विमान नहीं खरीदेगा जिसकी डिलीवरी में दशकों लग जाएं।

हाल ही में, सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति (CCS) ने AMCA के लिए नए प्रोग्राम एग्जीक्यूशन मॉडल को मंज़ूरी दी है। अब यह प्रोजेक्ट सिर्फ सरकारी कंपनी के भरोसे नहीं रहेगा, बल्कि इसमें प्राइवेट सेक्टर को भी बराबरी से शामिल किया जा रहा है।

इस स्पेशल पर्पस व्हीकल (SPV) मॉडल और सार्वजनिक-निजी भागीदारी (Public-Private Partnership) से एक साथ कई प्रोडक्शन लाइनें शुरू हो सकेंगी।

यही फॉर्मूला तेजस Mk2 के लिए भी वरदान साबित होगा। एक प्रोडक्शन लाइन से हम भारतीय वायुसेना की ज़रूरतें पूरी कर सकते हैं, और दूसरी लाइन पूरी तरह से एक्सपोर्ट ऑर्डर्स के लिए डेडिकेटेड (समर्पित) हो सकती है, ताकि घरेलू ज़रूरतों के चलते विदेशी ग्राहकों को इंतज़ार न करना पड़े।

3. सबसे बड़ी चुनौती: इंजन इंडिपेंडेंस (स्वदेशी इंजन)​

हवा में राज करने के लिए एक ताकतवर दिल (इंजन) की ज़रूरत होती है। फिलहाल, तेजस Mk2 और AMCA Mk1 में अमेरिका का बेहतरीन GE-F414 इंजन इस्तेमाल किया जाएगा। यह एक शानदार इंजन है और भारत में भारी मात्रा में इसका उत्पादन भी होगा।

लेकिन, असली पेंच है अमेरिकी एक्सपोर्ट कंट्रोल लॉ (निर्यात नियंत्रण कानून)। चूंकि इंजन अमेरिकी है, इसलिए यदि भारत इन विमानों को किसी तीसरे देश को बेचना चाहता है, तो उसे अमेरिका से मंज़ूरी लेनी होगी। अमेरिका की विदेश नीति और नियमों के हिसाब से यह मंज़ूरी एक अड़चन बन सकती है।

लंबे समय तक एक्सपोर्ट मार्केट में टिकने के लिए भारत को 'इंजन इंडिपेंडेंस' (स्वदेशी इंजन तकनीक) हासिल करनी ही होगी।

इसीलिए AMCA Mk2 के लिए फ्रांसीसी कंपनी Safran और भारत के GTRE के बीच जिस जॉइंट वेंचर (JV) पर काम चल रहा है।

अगर हम अपना खुद का हाई-थ्रस्ट इंजन बना लेते हैं, तो हम दुनिया में किसी भी देश को, किसी भी महाशक्ति के दबाव में आए बिना, अपने लड़ाकू विमान बेच सकेंगे।

स्ट्रैटेजिक आज़ादी चाहने वाले देशों के लिए यह सबसे बड़ा आकर्षण होगा।

4. आफ्टर-सेल्स सर्विस और MRO हब​

विमान बेचना तो बस शुरुआत है, असली रिश्ता सर्विसिंग से बनता है।

अगर भारत के ग्राहक के विमान में कोई खराबी आती है, तो उसे भारी भरकम पुर्जे ठीक करवाने के लिए वापस भारत भेजने की ज़रूरत नहीं पड़नी चाहिए। भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य पूर्व और अफ्रीका में अपने क्षेत्रीय MRO (Maintenance, Repair, and Overhaul) हब बनाने होंगे।

आजकल दुनिया परफॉर्मेंस-बेस्ड लॉजिस्टिक्स (PBL) कॉन्ट्रैक्ट मांगती है। इसका मतलब है कि ग्राहक सिर्फ पुर्जे नहीं खरीदता, बल्कि मैन्युफैक्चरर इस बात की गारंटी लेता है कि बेड़े के इतने प्रतिशत विमान हमेशा उड़ान भरने के लिए तैयार (Operationally Ready) रहेंगे।

इससे एयरक्राफ्ट का 'डाउनटाइम' कम होगा और ग्राहकों का भारत की डिफेंस इंडस्ट्री पर भरोसा कई गुना बढ़ जाएगा।

निष्कर्ष​

ग्लोबल फाइटर जेट मार्केट एक बेहद प्रतिस्पर्धी रणभूमि है।

भारत को एक 'कम्प्लीट पैकेज' देना होगा—जिसमें आधुनिक सॉफ्टवेयर अपग्रेड्स, साइबर सुरक्षा, AI-आधारित मिशन प्लानिंग, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (ToT), और प्राइवेट कंपनियों के साथ स्थानीय उद्योग को बढ़ावा देना शामिल हो।

अगर हम शानदार डिज़ाइन के साथ OSA, तेज़ प्रोडक्शन और स्वदेशी इंजन का कॉम्बो पेश कर सकें, तो वह दिन दूर नहीं जब दुनिया के आसमान में 'मेक इन इंडिया' फाइटर जेट्स की ही गूंज होगी।
 

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